क्या स्त्री इस समाज में second class citizen है?

स्त्री हमारे समाज में बस एक second class citizen है यह प्रश्न अक्सर मेरे मन में उठता है अपने आस-पास के सामाजिक रहन-सहन को देखकर अपने आस -पास के रिश्तों के समीकरण को देखकर जब भी मैं स्त्री और पुरूष के बराबरी पर बात करती हूँ तो हर जगह एक जैसा ही हाल देखती हूँ।

किसी भी रिश्ते में चाहे माता और पिता हो या भाई -बहन या बेटा -बेटी के रुप में जब भी स्त्री -पुरुष का नाम साथ आता है तब -तब बार- बार देखने को मिलता है की स्त्री को हमेशा एक द्वितीय स्तर पर रखकर देखा जाता है उनकी पढ़ाई हो या स्वास्थ्य सम्बंधित कोई बात या घर में सुबह शाम घर के हर छोटी बात जैसे पुरूषों के बाद खाना और अन्य बहुत सी रोज़मर्रा की बातें स्त्री को हमेशा घर हो या बाहर उन्हें second class citizen की तरह ही देखा व समझा जाता है ।

परम्परागत तरीक़े से चली आ रही यह कुरीति आज समाज के रग -रग में बस चुकी है हर घर हर परिवार में यह कुरीति यह सोच जन्म से ही चलायमान हो जाती है जिसके कारण घर की बेटी अपने जीवन की शुरुआत से ही खुद को द्वितीय स्तर का मान कर हर पड़ाव पर समझौता करने लगती है वह भी खुद को किसी ट्रेन के डिब्बे में बैठे second class citizen की तरह जीने लगती हैं यह एक सोचनीय स्थिति है एक ऐसा प्रश्न है जो हर किसी को खुद से और औरों से भी पूछने की आवश्यकता है की क्या स्त्री इस समाज में खुद के घर में second class citizen है।

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