सूना-सूना घर -आँगन

कौन सुनता है

मन का रूदन

कौन सुनता हैं

रोम-रोम का क्रन्दन

कहाँ कोई देखता है

अस्रुओं का अनुरोध

अब कहाँ कोई पढ़ता है

अधरों का निवेदन

अपना-अपना है सबका

कहना-सुनना

अपना-अपना है सबका

घर -आँगन अपना जीवन

अब यहाँ,कहाँ ठहरता है कोई

अब खाली-खाली रहता है

ये मेरा घर-अँगना

टूट गया जब से

वो बचपन का बन्धन

सूना-सूना हो गया ये घर-आँगन

क्या यही है जीवन

क्या यही संसार का नियम

क्या इसे ही कहते हैं जीवन

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Akanksha

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2 responses to “सूना-सूना घर -आँगन”

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